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हाल के घटनाक्रम

विदेश में निवेश की नीति को पिछले दो वर्षों में काफी उदार बनाया गया है। मुख्‍य नीतिगत परिवर्तन नीचे बताए गए हैं।
  • विदेशी मुद्रा की बाजार खरीद करके विदेशों में निवेश करने वाली भारतीय कम्‍पनियां अब अपने निवल मूल्‍य के 100 प्रतिशत तक भारतीय रिजर्व बैंक/भारत सरकार के पूर्वानुमोदन के बिना भी ऐसा कर सकती हैं; जो 50 प्रतिशत की पूर्ववर्ती सीमा से बढ़ाई गई है (देखें आरबीआई अधिसूचना सं 83/आर बी 2003 दिनांक 1 मार्च, 2003)

  • प्रमाणित ट्रैक रिकार्ड वाली कोई भी भारतीय कम्‍पनी किसी वास्‍तविक व्‍यापारिक कार्यकलाप में लगी विदेशी कम्‍पनी में निवेश के लिए बाजार खरीद के जरिए 100 मिलियन अमरीकी डालर की समग्र सीमा के भीतर अपने निवल मूल्‍य के 100 प्रतिशत तक का निवेश करने के लिए पात्र है। भारतीय कम्‍पनी की उसी महत्‍वपूर्ण गतिविधि में विदेशों में निवेशों को प्रतिबंधित करने का प्रावधान अब हटा दिया गया है (देखें आरबीआई अधिसूचना सं 83/आर बी 2003 दिनांक 1 मार्च, 2003)

  • भारतीय पक्षकार द्वारा स्‍वत:चालित मार्ग के अंतर्गत विदेशों में निवेश करने की वार्षिक सीमा बढ़ाकर 100 मिलियन अमरीकी डालर (50 मिलियन अमरीकी डालर से बढ़ाकर) और सार्क देशों (पाकिस्‍तान को छोड़कर) और म्‍यांमार में प्रत्‍यक्ष निवेशों के लिए बढ़ाकर 150 मिलियन अमरीकी डालर (75 मिलियन अमरीकी डालर से बढ़ाकर) और नेपाल तथा भूटान में रूपया निवेशों के लिए सीमा बढ़ाकर 700 करोड़ रू (350 करोड़ रू से बढ़ाकर) कर दी गई। (देखें आरबीआई अधिसूचना सं फेमा 53/2002-आर बी दिनांक 1 मार्च, 2002 और फेमा 79/2002-आर बी दिनांक 10 दिसम्‍बर, 2002)

  • देश की एसईजेड यूनिटें स्‍वत:चालित मार्ग के अंतर्गत 100 मिलियन अमरीकी डालर की सीमा का पालन किए बिना किसी भी राशि का विदेश में निवेश कर सकती हैं बशर्तें वित्‍त-पोषण उन यूनिटों के ईईएफसी शेष में से किया गया हो (देखें आरबीआई अधिसूचना सं फेमा 49/2002-आर बी दिनां‍क 19 जनवरी, 2002)

  • स्‍वत:चालित मार्ग के तहत विदेशों में निवेश की अनुमति तीन वर्ष की बजाय वार्षिक तौर पर करने की अनुमति दी गई और भारतीय कम्‍पनियों के लिए तीन वर्षकी लाभप्रदता की शर्त हटा दी गई है (देखें आरबीआई अधिसूचना सं फेमा 40/2001-आर बी दिनांक 2 मार्च, 2001)

  • विदेशों में निवेश का वित्‍तपोषण एडीआर/जीडीआर प्राप्तियों की 100 प्रतिशत राशि से करने की अनुमति दी गई है; जिसे 50 प्रतिशत की सीमा से बढ़ाया गया है (देखें आरबीआई अधिसूचना सं फेमा 40/2001-आर बी दिनांक 2 मार्च 2001)

  • विदेशों में निवेश के लिए भारतीय रिजर्व बैंक से अग्रिम में ब्‍लाक-आवंटन उपलब्‍ध कराना संभव हो गया है। (देखें आरबीआई अधिसूचना सं फेमा 40/2001-आर बी दिनांक 2 मार्च 200

  • विदेशों में निवेश पेशेवर सेवाएं मुहैया कराने में लगी भागीदारी फर्मों और कम्‍पनियों के लिए बोल दिया गया है (देखें आरबीआई अधिसूचना सं फेमा 40/2001-आर बी दिनांक 2 मार्च 2001)
  • ऐसी आम अनुमति में वे निवेश प्रस्‍ताव शामिल नहीं जिनमें विदेश में धारिता कम्‍पनी स्‍थापित करने या विशेष प्रयोज्‍य साधन स्‍थापित करने की परिकल्‍पना की गई हो जो प्रचालन यूनिटों के रूप में एक या अधिक दर्जा कम अनुषंगी कम्‍पनियां स्‍थापित करेंगी। दो-स्‍तरीय संरचना के जरिए ऐसे निवेश प्रस्‍ताव तथा भारतीय कम्‍पनी के शेयरों की अदला-बदली करके किए गए निवेश के लिए रिजर्व बैंक के पूर्वानुमोदन की आवश्‍यक होगी।

  • भारतीय पक्षकार ऐसी विदेशी कम्‍पनी को ऋण/गारंटी दे सकती है जिसमें इसकी इक्विटी भागीदारी हो।

  • भारतीय पक्षकार रिजर्व बैंक की सावधान सूची पर नहीं होना चाहिए या प्रवर्तन निदेशालय द्वारा जांचाधीन नहीं होना चाहिए या भारत में बैंकिंग व्‍यवस्‍था का चूककर्ता नहीं होना चाहिए जिसका नाम रिजर्व बैंक द्वारा प्रकाशित/परिचालित चूककर्ता की सूची में आया हो।

  • ंयुक्‍त उद्यम/पूर्ण स्‍वामित्‍वाधीन अनुषंगी कम्‍पनी से जुड़े सभी लेन-देन भारतीय पक्षकार द्वारा नामित किए जाने वाले प्राधिकृत डीलर की शाखा के जरिए किए जाने चाहिए

  • किसी मौजूदा विदेशी कम्‍पनी के आंशिक/पूर्ण अधिग्रहण के मामले में, जहां निवेश 5.00 मिलियन अमरीकी डालर से अधिक हो, वहां कम्‍पनी के शेयरों का मूल्‍यांकन सेबी के पास पंजीकृत श्रेणी I मर्चेन्‍ट बैंकर अथवा मेजबान देश में उपयुक्‍त विनियामक प्राधिकरण के पास पंजीकृत भारत से बाहर निवेश बैंकर/मर्चेन्‍ट बैंकर द्वारा किया जाएगा और अन्‍य सभी मामलों में सीए/सीपीए द्वारा किया जाएगा।

वित्‍तपोषण का तरीका

विदेश में संयुक्‍त उद्यम/पूर्ण स्‍वामित्‍वाधीन अनुषंगी कम्‍पनी में निवेश का वित्‍तपोषण निम्‍नलिखित एक या अधिक स्रोतों से किया जा सकता है:

  • भारतीय पक्षकार के ईईएफसी खाते में रखे शेष से।

  • विदेशी मुद्रा का आहरण करके जिसमें पिछले लेखापरीक्षित तुलन-पत्र की तारीख को भारतीय पक्षकार के निवल मूल्‍य के 100 प्रतिशत तक भारत में प्राधिकृत डीलर से निर्यातों का मुद्रीकरण किया जाना भी शामिल है।

  • एडीआर/जीडीआर निर्गमों के जरिए जुटाई गई विदेशी मुद्रा निश्चियों की प्राप्तियों का उपयोग।

तथापि, जब ऐसे निवेश वित्‍तीय क्षेत्र में किए जाएंगे तो वे अधिसूचना के विनियम 7 के अनुपालन के अधीन होंगे।

 
(पृष्‍ठ 6 का दूसरा )
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