भारत की स्वतंत्रता के बाद अनेकानेक योजनाएं और अभियान जैसे सामुदायिक विकास कार्यक्रम और सर्व शिक्षा मुहिम सरकार द्वारा शुरू किए गए, यह साक्षरता फैलाने की प्रक्रिया को त्वरित करने के लिए किए गए। प्रौढ़ शिक्षा के जरिए किसानों के बीच अधिक ऊपज देने वाले बीजों की किस्मों को लोकप्रिय बनाने के लिए एक अन्तर मंत्रालयीन परियोजना जो किसानों के लिए प्रशिक्षण एवं कार्यात्मक साक्षरता कहलाती है, आरंभ की गई। एक योजना जिसे प्रौढ़ महिलाओं के लिए कार्यात्मक साक्षरता (एफएलएडब्ल्यू) कहा जाता है, को वर्ष 1975-76 में, महिलाओं में साक्षरता दर बढ़ाने के लिए शुरू किया गया। प्रारंभिक शिक्षा को व्यापक बनाने के लिए और व्यापक प्रौढ़ शिक्षा के लिए सम्पूर्ण साक्षरता प्राप्त करने के लिए दोहरी नीति अपनायी गई है। वर्षों से शिक्षा संबंधी राष्ट्रीय नीति ने निरक्षरता उन्मूलन कार्यक्रमों विशेषतया महिलाओं के बीच को अनुचित प्राथमिकता दी है। सरकार ने शिक्षा के लिए एकीकृत तरीका अपनाने का निर्णय लिया है। इसका अर्थ यह है कि सम्पूर्ण साक्षरता अभियान और साक्षरता पश्च कार्यक्रम का संचालन एक साक्षरता परियोजना के अधीन कार्य करते हैं। इस तरीके से निरक्षरता की समस्या का समाधान सम्पूर्णतया के आधार पर किया जा सकता है।
इन प्रयासों के परिणामस्वरूप साक्षरता अभियान के अधीन देश में साक्षरता दर वर्ष 1951में 18.33 प्रतिशत से बढ़कर वर्ष 2001 में 65.38 प्रतिशत हो गई है। इस प्रकार से पांच दशकों में साक्षरता का प्रतिशत 47.05 प्रतिशत बढ़ा था या प्रति दशक 9.41 प्रतिशत की औसत वृद्धि हुई। 2001 वर्ष, की जनगणना के अनुसार पुरूष साक्षरता 78.85 प्रतिशत थी और महिला साक्षरता 54.16 प्रतिशत था।
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