अंतरराष्ट्रीय परिधि में भारतीय शिक्षा को मान्यता प्राप्त होने तथा अकादमिक पाठ्यक्रमों के एक स्पष्टतया अद्वितीय स्वांगीकरण (समावेशन) के कारण, बढ़ती संख्या मे विभिन्न राष्ट्रों में विदेशी विद्यार्थी और ज्ञान प्राप्त करने की अपनी इच्छा को तुष्ट करने के लिए भारत में आए है। भारत में इसके प्रमुख राज्यों एवं शहरों में फैले हुए विश्वविद्यालय एवं महाविद्यालयों की एवं काफी प्रभावशाली सूची है जिनमें समय समय पर असंख्य विदेशी विद्यार्थियों को प्रविष्ट किया गया है। भारतीय संस्कृति की समृद्धि तथा अन्वेषणीय विषयों के कभी नि:शेष न होने वाले भंडार ने इन विदेशी विद्यार्थियों की जिज्ञासा तथा अपने ज्ञान क्षैतिज को विस्तारित करने की इच्छा को जागृत किया है। अब काफी समय से भारत में विदेशी विद्यार्थियो के अंतर्वाह में सुस्थिर वृद्धि दर्शित हुई है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय, कलकत्ता विश्वविद्यालय इत्यादि जैसे प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों द्वारा विदेशी विद्यार्थियों के लिए कुछ अत्यंत वांछित पाठ्यक्रम प्रस्तुत किए जाने से भारत ने गुणत्तापूर्ण शिक्षा के लिए एक अनुशंसनीय गंत्वय होने की प्रतिष्ठा हासिल कर ली है।
इस मामले में भारत सरकार ने अपनी शिक्षा नीतियों में सुधार किया है ताकि ऐसे विदेशी विद्यार्थियों को उनके द्वारा अपेक्षित समस्त सुविधाएं तथा सहायता प्राप्त करने मे समर्थ बनाया जा सके। राज्य शिक्षा विभाग तथा विभिन्न विश्वविद्यालयों के शासकीय निकाय भी इन विद्यार्थियों की सहायता क लिए आगे आए है। इसके अतिरिक्त अधिकांश महाविद्यालयों में व्याप्त अति यथार्थवादी वातावरण उन्हें साधारण से ऊपर उठने के लिए प्रेरित करने के तत्व के पक्ष में कार्य करता है। इन अंतरराष्ट्रीय विद्यार्थियों से यह आशा की जाती है कि वे संबंधित विश्वविद्यालयों तथा महाविद्यालयों के माध्यम से सीटों के आरक्षण, शुल्क संरचना इत्यादि जैसे मामलों के संबंध में अपनी पृच्छाओं की तुष्टि करें।
शैक्षणिक संस्थाओं में (चिकित्सा संस्थाओं को छोड़कर) प्रतिशत अधिसंख्य सीटों का एक तिहाई खाड़ी तथा दक्षिण पूर्व एशिया के अनिवासी भारतीयों के बच्चों के लिए आरक्षित है।
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